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Friday, July 23, 2010
कर्म का सिधांत --
आज गुजरात में खलबली मच गई हे,गांधीनगर से लेकर पान के गले तक एक ही बात चर्चा में हे ,की गृह राज्यमंत्री का क्या होगा? कई लोग तो अटकले भी लगेने गले हे,ये होगा ,वो होगा...विगेरे ..मगर ये कम सीबीआई का हे वो करेगी हमें अभी कोई अपना व्युस नहीं देना हे ,,हमे इसे कुछ और नजरिये से देखना हे,- एक बात इससे साफ होती हे की आप कितने ही बड़े क्यों न हो,कर्म का सिन्धांत आपको नहीं छोड़ेगा ..सता के नशे में आदमी को कुछ समय तक एसा लगता हे की में तो बड़ा अफ्शर हु,में मिनिस्टर हु,मेरे पर बड़े बड़े लोगो का हाथ हे,विगेरे ...लेकिन वो यह नहीं समजते की उपरवाला सब हिसाब करता हे और वो भी बिना रिस्वतके-आप जब किसीको अन्याय कर रहेहे वो सही हे और जब आपके कर्म का बदले की सुरुआत होती हे तो गलत हे...अरे वाह ..मगर सब आपकी तरह रिश्वत खोर भू नहीं होते न...और उससे भी आगे भगवान तो बिलकुल नहीं...इसलिए सही कहा हे की कर्म का सिधांत किसीको नहीं छोड़ता ....तो आज से आप भी सता के मद में किसीको अन्याय या किसीका बुरा करते हो तो बंद कर दीजिये गा ,क्युकी हिसाब तो होने वाला ही हे दोस्त.....फिर आप मिनिस्टर ही क्यों न हो...जय माताजी...
Wednesday, July 14, 2010
मुलाकात----
आज के राजनेता ओ का कार्य देख कर सोचा की भगवान क्या सोचते होंगे ,और एक काल्पनिक मुलाकात करली ॥
में-पहेले सादर प्रणाम प्रभु
गोड-प्रणाम
में-प्रभु एक उलज़ंन थी ,इसलिए सोचा की अगर आप समाधान करवा दे तो ,
गोड -क्या ,यही न की राजनेता ओ देश को लुंट रहे हे और उनका कुछ बुरा नहीं होता?
में- आपकी आशीष प्रभु ,सही पहेचाना,मुझे बार बार यही सवाल मनमे उठता हे की,भाजप ,कांग्रेश ,और सभी पार्टी के राजनेता किसी न किसी तरह देश को लुंट रहे हे,और महेंगाई बढ़ा रहे हे ,वो एक्स हो कर भी सभी लाभ उठाते हे,उन्हें सबकुछ मुफ्त में मिलता हे,और उनकी तन्खाये तो महगाई से भी ऊँची दर से बढ़ रही हे,इसमें से कुछ तो जब राजनीती में आए तब मजदुर थे और अब प्लेन में घूम रहे हे,इतना सब होने के बावजूद इनका कुछ बिगाड़ नहीं सकता ?.....
गोड- देश को लुंट रहे हे वो सही हे ,वो गलत करते हे वो भी सही हे, मगर कोई कुछ उनका बिगाड़ नहीं सकता,, वो तुम्हारी ही नहीं सभी भगतो की बड़ी गलती हे,हिसाब सबका होता हे,इन्ह लोगो का कुछ पुन्य पूर्व जन्म का इसे जन्म का होता हे उसी वजह से उनकी कुछ समय तक गडी चलती हे मगर जब उनके पुन्य से ज्यादा पाप का हिसाब बढ़ जाता हे तब आपने देखे होंगे कही राजनेता ,अफशरो,उद्योगपति ,वगेरे का क्या हाल हुआ हे और होते हे,तो ये तो उनको एक क्षणिक मोका दिया जाते हे कुछ अच्छा करने का ,मगर वो कर नहीं पाते हे,और वो इसे क्षेत्र में आकर उनके और जन्मो को भी बिगाड़ देते हे,और ये मत समजो की में हिसाब नहीं करता ,आपके हर कर्म का हिसाब बिना रिश्वत यहा होता हे,और वो पैसा इकठा करते हे वो सब से बड़े मुर्ख हे,क्युकी उनके साथ वो आता तो हे नहीं,वो तो सिर्ह्फ़ मेरी फेलाई हुई माया हे,वो तो मेरे पास ही रहेगी भीर भी वो समजते हे की हमने इस राजनीती में बहोत कमाया मगर उनका भ्रम हे,आप तो देखते हे न की कुछ लेकर साथ गए हे क्या? नहीं न तो मगर में कहेता हु की वो मेरे पास क्या लेकर ए ,वो उनके किये हुए कर्म लेकर मेरे पास आए ,वो सम्पति तो मेरी ही थी और फिर भी मेने उन्हें अगर वो सम्पति अछे काम में खर्च करेंगे तो अच्छा कर्म देने का भी वादा किया मगर इसने तो वो नहीं किया ,उल्टा बुरे कर्म में ही उपयोग किया,इसलिए देखो ये जो भी कर रहे हे वो उन्हें भुगतना ही पड़ेगा ......अब ई बात समज्मे,और उनका कर्म के हिसाब से मेरे पास चुकते करना ही हे,॥
में- ओह्ह प्रभु आपने तो इसी मुलाकात दी ,की ये न सिर्फ मेरे मीडिया क्षेत्र में सिमित रही मगर मेरे जीवन को ही भा गई.......जय श्री कृष्ण॥
में-पहेले सादर प्रणाम प्रभु
गोड-प्रणाम
में-प्रभु एक उलज़ंन थी ,इसलिए सोचा की अगर आप समाधान करवा दे तो ,
गोड -क्या ,यही न की राजनेता ओ देश को लुंट रहे हे और उनका कुछ बुरा नहीं होता?
में- आपकी आशीष प्रभु ,सही पहेचाना,मुझे बार बार यही सवाल मनमे उठता हे की,भाजप ,कांग्रेश ,और सभी पार्टी के राजनेता किसी न किसी तरह देश को लुंट रहे हे,और महेंगाई बढ़ा रहे हे ,वो एक्स हो कर भी सभी लाभ उठाते हे,उन्हें सबकुछ मुफ्त में मिलता हे,और उनकी तन्खाये तो महगाई से भी ऊँची दर से बढ़ रही हे,इसमें से कुछ तो जब राजनीती में आए तब मजदुर थे और अब प्लेन में घूम रहे हे,इतना सब होने के बावजूद इनका कुछ बिगाड़ नहीं सकता ?.....
गोड- देश को लुंट रहे हे वो सही हे ,वो गलत करते हे वो भी सही हे, मगर कोई कुछ उनका बिगाड़ नहीं सकता,, वो तुम्हारी ही नहीं सभी भगतो की बड़ी गलती हे,हिसाब सबका होता हे,इन्ह लोगो का कुछ पुन्य पूर्व जन्म का इसे जन्म का होता हे उसी वजह से उनकी कुछ समय तक गडी चलती हे मगर जब उनके पुन्य से ज्यादा पाप का हिसाब बढ़ जाता हे तब आपने देखे होंगे कही राजनेता ,अफशरो,उद्योगपति ,वगेरे का क्या हाल हुआ हे और होते हे,तो ये तो उनको एक क्षणिक मोका दिया जाते हे कुछ अच्छा करने का ,मगर वो कर नहीं पाते हे,और वो इसे क्षेत्र में आकर उनके और जन्मो को भी बिगाड़ देते हे,और ये मत समजो की में हिसाब नहीं करता ,आपके हर कर्म का हिसाब बिना रिश्वत यहा होता हे,और वो पैसा इकठा करते हे वो सब से बड़े मुर्ख हे,क्युकी उनके साथ वो आता तो हे नहीं,वो तो सिर्ह्फ़ मेरी फेलाई हुई माया हे,वो तो मेरे पास ही रहेगी भीर भी वो समजते हे की हमने इस राजनीती में बहोत कमाया मगर उनका भ्रम हे,आप तो देखते हे न की कुछ लेकर साथ गए हे क्या? नहीं न तो मगर में कहेता हु की वो मेरे पास क्या लेकर ए ,वो उनके किये हुए कर्म लेकर मेरे पास आए ,वो सम्पति तो मेरी ही थी और फिर भी मेने उन्हें अगर वो सम्पति अछे काम में खर्च करेंगे तो अच्छा कर्म देने का भी वादा किया मगर इसने तो वो नहीं किया ,उल्टा बुरे कर्म में ही उपयोग किया,इसलिए देखो ये जो भी कर रहे हे वो उन्हें भुगतना ही पड़ेगा ......अब ई बात समज्मे,और उनका कर्म के हिसाब से मेरे पास चुकते करना ही हे,॥
में- ओह्ह प्रभु आपने तो इसी मुलाकात दी ,की ये न सिर्फ मेरे मीडिया क्षेत्र में सिमित रही मगर मेरे जीवन को ही भा गई.......जय श्री कृष्ण॥
अजनो रुपालो देखतो मानवी.....
૧-આજનો રૂપાળો દેખાતો માનવી દોસ્ત, કેવા ઢોંગ કરેછે ,
ઈર્ષા થી ખદબદતો હોવા છતાં,પ્રેમનો દેખાવ કરેછે-
દુશ્મન ને મળવા છતાં,મિત્ર જેવો વ્યવહાર કરેછે,
કરેછે બેફામ ભ્રષ્ટાચાર,છતાં ઈમાનદારી પર ભાષણ કરેછે,-આજનો...
૨- પ્રજા ને લુંટ તો હોવા છતાં,સેવા ના દેખાડા કરેછે,
પાપની ભારીઓ બાન્ધ્તો હોવા છતાં,પુણ્ય ના બણગા ફૂન્કેછે-
આંખો માં ઝેર વસતો હોવા છતાં ,અમીના છાંટણા હોવાનો આભાસ કરાવે છે,--આજનો રૂ....
૩-જર ,જમીન ,અને જોરુ પાછળ ઝગડા કરતો હોવા છતાં,મોભાદાર હોવાનો દેખાવ કરેછે,
પોતે દુખની અટારી પર ઉભો હોવા છતાં ,સુખ શાંતિ ના અભરખા દેખાડે છે,
ટ્રસ્ટો બનાવી રૂપિયા ખંખેર તો પોતે ,લક્ષ્મી થી અલિપ્ત રહેવાની શિખામણો આપે છે ...આજનો રૂ.......
૪- ન જાણતો હોવા છતાં,બધું જાણતો હોવાનો ઢોંગ કરેછે ,
વિશ્વાશ્ઘાતી હોવા છતાં,વિશ્વાસ નો મહત્વ સમજાવે છે,
ઈશ્વર ,અલાહ માં ન માનતો હોવા છતાં,મંદિર,મસ્જીદ,બનાવે છે,
પ્રજા માં હીરો દેખાવા માટે ,થોડી ખર્ચી લુંટા વે છે,-આજનો રૂ....
૫- સુંદર કપડા પહેરી ને,પ્રતિષ્ઠિત હોવાનો દેખાવ કરેછે,
કાળા નાણાં ખર્ચી ને,સ્ટેજ પર સારા ભાષણ કરેછે,
વ્યભિચારી હોવા છતાં ,આદર્શ હોવાનો દેખાડો કરેછે-આજનો રૂ...
૬-મૃત્યુ સૈયા પર આવતાં,રૂપ ,પાવર ,મની નું અભિમાન ઓશરી જાય છે,
પોતે કરેલા બુરા કર્મો થી પોતે જ વિંધાય છે,
જિંદગી ના ઢોંગ બધા મોડે મોડે યાદ આવેછે,
કહે ઇસુદાન ,દોસ્ત માનવી આખર પોતે પોતાને છેતરાવે છે ...આજનો રૂ.-ઇસુદાન ગઢવી ............
ઈર્ષા થી ખદબદતો હોવા છતાં,પ્રેમનો દેખાવ કરેછે-
દુશ્મન ને મળવા છતાં,મિત્ર જેવો વ્યવહાર કરેછે,
કરેછે બેફામ ભ્રષ્ટાચાર,છતાં ઈમાનદારી પર ભાષણ કરેછે,-આજનો...
૨- પ્રજા ને લુંટ તો હોવા છતાં,સેવા ના દેખાડા કરેછે,
પાપની ભારીઓ બાન્ધ્તો હોવા છતાં,પુણ્ય ના બણગા ફૂન્કેછે-
આંખો માં ઝેર વસતો હોવા છતાં ,અમીના છાંટણા હોવાનો આભાસ કરાવે છે,--આજનો રૂ....
૩-જર ,જમીન ,અને જોરુ પાછળ ઝગડા કરતો હોવા છતાં,મોભાદાર હોવાનો દેખાવ કરેછે,
પોતે દુખની અટારી પર ઉભો હોવા છતાં ,સુખ શાંતિ ના અભરખા દેખાડે છે,
ટ્રસ્ટો બનાવી રૂપિયા ખંખેર તો પોતે ,લક્ષ્મી થી અલિપ્ત રહેવાની શિખામણો આપે છે ...આજનો રૂ.......
૪- ન જાણતો હોવા છતાં,બધું જાણતો હોવાનો ઢોંગ કરેછે ,
વિશ્વાશ્ઘાતી હોવા છતાં,વિશ્વાસ નો મહત્વ સમજાવે છે,
ઈશ્વર ,અલાહ માં ન માનતો હોવા છતાં,મંદિર,મસ્જીદ,બનાવે છે,
પ્રજા માં હીરો દેખાવા માટે ,થોડી ખર્ચી લુંટા વે છે,-આજનો રૂ....
૫- સુંદર કપડા પહેરી ને,પ્રતિષ્ઠિત હોવાનો દેખાવ કરેછે,
કાળા નાણાં ખર્ચી ને,સ્ટેજ પર સારા ભાષણ કરેછે,
વ્યભિચારી હોવા છતાં ,આદર્શ હોવાનો દેખાડો કરેછે-આજનો રૂ...
૬-મૃત્યુ સૈયા પર આવતાં,રૂપ ,પાવર ,મની નું અભિમાન ઓશરી જાય છે,
પોતે કરેલા બુરા કર્મો થી પોતે જ વિંધાય છે,
જિંદગી ના ઢોંગ બધા મોડે મોડે યાદ આવેછે,
કહે ઇસુદાન ,દોસ્ત માનવી આખર પોતે પોતાને છેતરાવે છે ...આજનો રૂ.-ઇસુદાન ગઢવી ............
Tuesday, June 29, 2010
सचाई
આજે કોઈ મેળાવડા કે કાર્યક્રમ માં જવાનું થાય છે ત્યારે ખુબ દુખ થાય છે કે જે માણસ આ સહેર ને ,રાજ્ય ને અને દેશ ને ખુબ મોટું નુકશાન કરેછે ,અપ્રમાણિક છે,લાલચુ છે તેવા જ લોકો સ્ટેજ પર જોવા મળેછે ,એટલું જ નહિ તેઓ લોકો ને ભાષણો થી ,કેમ પ્રગતી કરવું અથવા કેમ આગળ વધવું તેનું જ્ઞાન આપેછે. તેમાં અધિકારીઓ થી માંડી ને રાજનેતાઓ અને ઉદ્યોગ પતિ ઓ અને ગુનેગારો વધારે હોય છે....આ તમે ખુદ પણ જયારે કોઈ કાર્યક્રમ માં જાવ ત્યારે દરેક સ્ટેજ ના લોકો નું ભૂતકાળ જાણજો...(પૂછતાં નહિ..)કદાચ આજ સુધી સ્ટેજ પર બેસવાનું ખ્યાલ હોય તો વિચારજો ..બેસવું કે નહિ...જોકે એકાદ સારા વ્યક્તિ ને પણ ક્યારેક સ્ટેજ પર જોઈ સકાય છે પણ એતો ભાગ્યે જ જોવા મળતા હોય છે.....ઇસુદાન ગઢવી ..
Saturday, June 26, 2010
दिल की बात - ......
में जब पैदा हुआ तब सुकर करू देश के वीर जवानो का जिसकी वजह से देश आजाद हो गया था ,मगर में जिस छेत्र में जुड़ा हु ,वो मीडिया छेत्र से हमारे देश में चल रहा रिश्वत का कारोबार का पता चला,बहोत दुःख के साथ कहना पड़ता हे की ,सायद में जानता नहीं हु फिर भी ब्रिटिश सल्तनत आज की सरकारों और राजनेता ओ से अछी होंगी,हमारे देश में तिन प्रकार के लोग रहते हे,एक जो अमीर हे,दूसरा जो मध्यम और तीसरा गरीब ,मगर देश के कानून का गलत इस्तमाल करके हमारे कहलाते राजनेता ओ ने इसे देश को तिन छेत्र में बाँट दिया हे..आज आम आदमी छोटा सा गुनाह करता हे तो उन्हें सजा मिल तजि हे ,वो गलत भी नहीं हे,क्युकी गुन्हा करता हे तो सजा मिलनी भी चाहिए,मगर अमीर आदमी हजारो करोड़ का चुना लगा देता हे,मोत के सोदगारो से रिश्ता रखता हे,कानून से खिलवाड़ करता हे,गलत इस्तेमाल करता हे,इसे बड़े लोगो को सजा की बजाय कानून उसे पोस्ता हे,क्या यही दुनिया की सबसे बड़ी लोकशाही हे, आज कानून के रक्षक खुद भक्षक बनते जाते हे,एक गाव की बात करू तो गाव में पुलिसे नहीं थे तो गाव वालो ने पुलिसे की मांग की और पुलिस थाना लग गया मगर अब पुलिस गाव वालो को रक्षा देने की बजाय उनसे ही हप्ता लेने लगी ,गाव वालो ने फिर मांग की की अब हमे पुलिस की जरुरत नहीं हे हम संभल लेंगे मगर तब तो बहोत देर हो चुकी थी....ये हल हे हमारे देश का हम कानून बनाते हे मगर वो गरीब के लिए ही बनाते हे,आज सरकार तेल की दाम भी कम्पनी ओ को सोप दी,जरा सोचो हमारे देश में उधोयोग पति राजनेता ओ को चुनाव के लिए फंड देकर खरीद लेता हे ,और बाद में उनकी भलाई के लिए कानून को भी बदला जाता हे,आज गरीब और गरीब बनता जा रहा हे और अमीर और अमीर,हमारे देश की हालत एक तोफानी समुद्र में तेर जाती नव की तरह हो गयी हे,आज हर तरफ बस एक ही नारा लगा हे लूटो जीना लुट सको उतना ,कहा जाके रुकेगा ये देश..................मुझे कभी कभी एसा लगता हे की कर्म के सिधान्तो से जोभी विपरीत चलता हे उसका उनजाम गीता में दिए गए करम के सिधांत के अनुसार उन्हें मिलता ही हे....तो जो चीज हमारी नहीं हे तो फिर गलत करके एकता करही क्यों रहेहे,सोचो भगवन राम अगर वनवश जाते वक्त अगर अपनी पहेचन लगे होती तो वोह वन में भी नहीं जाते और अपने बाप को भी बचा लेते मगर उन्हों ने एसा नहीं किया क्युकी वोह कर्म की विरुद्ध था तो हमे ये सोचना चाहिए की हम तो कुछ नहीं हे भीर भी अपनी पहेचन लगाने में पड़े हे,ये मत भूलो की हर व्यक्ति जो जन्म लेती हे उसका मोत भी पका हे तो आज आप मिनिस्टर होंगे मगर वो तो धरती पर हे..इसलिए गलत रस्ते से बचाना चाहिए........इसुदान गढ़वी
Sunday, June 13, 2010
मधुशाला / हरिवंशराय बच्चन
मृदु भावों के अंगूरों की आज बना लाया हाला,
प्रियतम, अपने ही हाथों से आज पिलाऊँगा प्याला,
पहले भोग लगा लूँ तेरा फिर प्रसाद जग पाएगा,
सबसे पहले तेरा स्वागत करती मेरी मधुशाला।।१।
प्यास तुझे तो, विश्व तपाकर पूर्ण निकालूँगा हाला,
एक पाँव से साकी बनकर नाचूँगा लेकर प्याला,
जीवन की मधुता तो तेरे ऊपर कब का वार चुका,
आज निछावर कर दूँगा मैं तुझ पर जग की मधुशाला।।२।
प्रियतम, तू मेरी हाला है, मैं तेरा प्यासा प्याला,
अपने को मुझमें भरकर तू बनता है पीनेवाला,
मैं तुझको छक छलका करता, मस्त मुझे पी तू होता,
एक दूसरे की हम दोनों आज परस्पर मधुशाला।।३।
भावुकता अंगूर लता से खींच कल्पना की हाला,
कवि साकी बनकर आया है भरकर कविता का प्याला,
कभी न कण-भर खाली होगा लाख पिएँ, दो लाख पिएँ!
पाठकगण हैं पीनेवाले, पुस्तक मेरी मधुशाला।।४।
मधुर भावनाओं की सुमधुर नित्य बनाता हूँ हाला,
भरता हूँ इस मधु से अपने अंतर का प्यासा प्याला,
उठा कल्पना के हाथों से स्वयं उसे पी जाता हूँ,
अपने ही में हूँ मैं साकी, पीनेवाला, मधुशाला।।५।
मदिरालय जाने को घर से चलता है पीनेवाला,
'किस पथ से जाऊँ?' असमंजस में है वह भोलाभाला,
अलग-अलग पथ बतलाते सब पर मैं यह बतलाता हूँ -
'राह पकड़ तू एक चला चल, पा जाएगा मधुशाला।'। ६।
चलने ही चलने में कितना जीवन, हाय, बिता डाला!
'दूर अभी है', पर, कहता है हर पथ बतलानेवाला,
हिम्मत है न बढूँ आगे को साहस है न फिरुँ पीछे,
किंकर्तव्यविमूढ़ मुझे कर दूर खड़ी है मधुशाला।।७।
मुख से तू अविरत कहता जा मधु, मदिरा, मादक हाला,
हाथों में अनुभव करता जा एक ललित कल्पित प्याला,
ध्यान किए जा मन में सुमधुर सुखकर, सुंदर साकी का,
और बढ़ा चल, पथिक, न तुझको दूर लगेगी मधुशाला।।८।
मदिरा पीने की अभिलाषा ही बन जाए जब हाला,
अधरों की आतुरता में ही जब आभासित हो प्याला,
बने ध्यान ही करते-करते जब साकी साकार, सखे,
रहे न हाला, प्याला, साकी, तुझे मिलेगी मधुशाला।।९।
सुन, कलकल़ , छलछल़ मधुघट से गिरती प्यालों में हाला,
सुन, रूनझुन रूनझुन चल वितरण करती मधु साकीबाला,
बस आ पहुंचे, दुर नहीं कुछ, चार कदम अब चलना है,
चहक रहे, सुन, पीनेवाले, महक रही, ले, मधुशाला।।१०।
जलतरंग बजता, जब चुंबन करता प्याले को प्याला,
वीणा झंकृत होती, चलती जब रूनझुन साकीबाला,
डाँट डपट मधुविक्रेता की ध्वनित पखावज करती है,
मधुरव से मधु की मादकता और बढ़ाती मधुशाला।।११।
मेहंदी रंजित मृदुल हथेली पर माणिक मधु का प्याला,
अंगूरी अवगुंठन डाले स्वर्ण वर्ण साकीबाला,
पाग बैंजनी, जामा नीला डाट डटे पीनेवाले,
इन्द्रधनुष से होड़ लगाती आज रंगीली मधुशाला।।१२।
हाथों में आने से पहले नाज़ दिखाएगा प्याला,
अधरों पर आने से पहले अदा दिखाएगी हाला,
बहुतेरे इनकार करेगा साकी आने से पहले,
पथिक, न घबरा जाना, पहले मान करेगी मधुशाला।।१३।
लाल सुरा की धार लपट सी कह न इसे देना ज्वाला,
फेनिल मदिरा है, मत इसको कह देना उर का छाला,
दर्द नशा है इस मदिरा का विगत स्मृतियाँ साकी हैं,
पीड़ा में आनंद जिसे हो, आए मेरी मधुशाला।।१४।
जगती की शीतल हाला सी पथिक, नहीं मेरी हाला,
जगती के ठंडे प्याले सा पथिक, नहीं मेरा प्याला,
ज्वाल सुरा जलते प्याले में दग्ध हृदय की कविता है,
जलने से भयभीत न जो हो, आए मेरी मधुशाला।।१५।
बहती हाला देखी, देखो लपट उठाती अब हाला,
देखो प्याला अब छूते ही होंठ जला देनेवाला,
'होंठ नहीं, सब देह दहे, पर पीने को दो बूंद मिले'
ऐसे मधु के दीवानों को आज बुलाती मधुशाला।।१६।
धर्मग्रन्थ सब जला चुकी है, जिसके अंतर की ज्वाला,
मंदिर, मसजिद, गिरिजे, सब को तोड़ चुका जो मतवाला,
पंडित, मोमिन, पादिरयों के फंदों को जो काट चुका,
कर सकती है आज उसी का स्वागत मेरी मधुशाला।।१७।
लालायित अधरों से जिसने, हाय, नहीं चूमी हाला,
हर्ष-विकंपित कर से जिसने, हा, न छुआ मधु का प्याला,
हाथ पकड़ लज्जित साकी को पास नहीं जिसने खींचा,
व्यर्थ सुखा डाली जीवन की उसने मधुमय मधुशाला।।१८।
बने पुजारी प्रेमी साकी, गंगाजल पावन हाला,
रहे फेरता अविरत गति से मधु के प्यालों की माला'
'और लिये जा, और पीये जा', इसी मंत्र का जाप करे'
मैं शिव की प्रतिमा बन बैठूं, मंदिर हो यह मधुशाला।।१९।
बजी न मंदिर में घड़ियाली, चढ़ी न प्रतिमा पर माला,
बैठा अपने भवन मुअज्ज़िन देकर मस्जिद में ताला,
लुटे ख़जाने नरपितयों के गिरीं गढ़ों की दीवारें,
रहें मुबारक पीनेवाले, खुली रहे यह मधुशाला।।२०।
बड़े बड़े परिवार मिटें यों, एक न हो रोनेवाला,
हो जाएँ सुनसान महल वे, जहाँ थिरकतीं सुरबाला,
राज्य उलट जाएँ, भूपों की भाग्य सुलक्ष्मी सो जाए,
जमे रहेंगे पीनेवाले, जगा करेगी मधुशाला।।२१।
सब मिट जाएँ, बना रहेगा सुन्दर साकी, यम काला,
सूखें सब रस, बने रहेंगे, किन्तु, हलाहल औ' हाला,
धूमधाम औ' चहल पहल के स्थान सभी सुनसान बनें,
झगा करेगा अविरत मरघट, जगा करेगी मधुशाला।।२२।
भुरा सदा कहलायेगा जग में बाँका, मदचंचल प्याला,
छैल छबीला, रसिया साकी, अलबेला पीनेवाला,
पटे कहाँ से, मधु औ' जग की जोड़ी ठीक नहीं,
जग जर्जर प्रतिदन, प्रतिक्षण, पर नित्य नवेली मधुशाला।।२३।
बिना पिये जो मधुशाला को बुरा कहे, वह मतवाला,
पी लेने पर तो उसके मुह पर पड़ जाएगा ताला,
दास द्रोहियों दोनों में है जीत सुरा की, प्याले की,
विश्वविजयिनी बनकर जग में आई मेरी मधुशाला।।२४।
हरा भरा रहता मदिरालय, जग पर पड़ जाए पाला,
वहाँ मुहर्रम का तम छाए, यहाँ होलिका की ज्वाला,
स्वर्ग लोक से सीधी उतरी वसुधा पर, दुख क्या जाने,
पढ़े मर्सिया दुनिया सारी, ईद मनाती मधुशाला।।२५।
एक बरस में, एक बार ही जगती होली की ज्वाला,
एक बार ही लगती बाज़ी, जलती दीपों की माला,
दुनियावालों, किन्तु, किसी दिन आ मदिरालय में देखो,
दिन को होली, रात दिवाली, रोज़ मनाती मधुशाला।।२६।
नहीं जानता कौन, मनुज आया बनकर पीनेवाला,
कौन अपिरिचत उस साकी से, जिसने दूध पिला पाला,
जीवन पाकर मानव पीकर मस्त रहे, इस कारण ही,
जग में आकर सबसे पहले पाई उसने मधुशाला।।२७।
बनी रहें अंगूर लताएँ जिनसे मिलती है हाला,
बनी रहे वह मिटटी जिससे बनता है मधु का प्याला,
बनी रहे वह मदिर पिपासा तृप्त न जो होना जाने,
बनें रहें ये पीने वाले, बनी रहे यह मधुशाला।।२८।
सकुशल समझो मुझको, सकुशल रहती यदि साकीबाला,
मंगल और अमंगल समझे मस्ती में क्या मतवाला,
मित्रों, मेरी क्षेम न पूछो आकर, पर मधुशाला की,
कहा करो 'जय राम' न मिलकर, कहा करो 'जय मधुशाला'।।२९।
सूर्य बने मधु का विक्रेता, सिंधु बने घट, जल, हाला,
बादल बन-बन आए साकी, भूमि बने मधु का प्याला,
झड़ी लगाकर बरसे मदिरा रिमझिम, रिमझिम, रिमझिम कर,
बेलि, विटप, तृण बन मैं पीऊँ, वर्षा ऋतु हो मधुशाला।।३०।
तारक मणियों से सज्जित नभ बन जाए मधु का प्याला,
सीधा करके भर दी जाए उसमें सागरजल हाला,
मज्ञल्तऌा समीरण साकी बनकर अधरों पर छलका जाए,
फैले हों जो सागर तट से विश्व बने यह मधुशाला।।३१।
अधरों पर हो कोई भी रस जिह्वा पर लगती हाला,
भाजन हो कोई हाथों में लगता रक्खा है प्याला,
हर सूरत साकी की सूरत में परिवर्तित हो जाती,
आँखों के आगे हो कुछ भी, आँखों में है मधुशाला।।३२।
पौधे आज बने हैं साकी ले ले फूलों का प्याला,
भरी हुई है जिसके अंदर पिरमल-मधु-सुरिभत हाला,
माँग माँगकर भ्रमरों के दल रस की मदिरा पीते हैं,
झूम झपक मद-झंपित होते, उपवन क्या है मधुशाला!।३३।
प्रति रसाल तरू साकी सा है, प्रति मंजरिका है प्याला,
छलक रही है जिसके बाहर मादक सौरभ की हाला,
छक जिसको मतवाली कोयल कूक रही डाली डाली
हर मधुऋतु में अमराई में जग उठती है मधुशाला।।३४।
मंद झकोरों के प्यालों में मधुऋतु सौरभ की हाला
भर भरकर है अनिल पिलाता बनकर मधु-मद-मतवाला,
हरे हरे नव पल्लव, तरूगण, नूतन डालें, वल्लरियाँ,
छक छक, झुक झुक झूम रही हैं, मधुबन में है मधुशाला।।३५।
साकी बन आती है प्रातः जब अरुणा ऊषा बाला,
तारक-मणि-मंडित चादर दे मोल धरा लेती हाला,
अगणित कर-किरणों से जिसको पी, खग पागल हो गाते,
प्रति प्रभात में पूर्ण प्रकृति में मुखिरत होती मधुशाला।।३६।
उतर नशा जब उसका जाता, आती है संध्या बाला,
बड़ी पुरानी, बड़ी नशीली नित्य ढला जाती हाला,
जीवन के संताप शोक सब इसको पीकर मिट जाते
सुरा-सुप्त होते मद-लोभी जागृत रहती मधुशाला।।३७।
अंधकार है मधुविक्रेता, सुन्दर साकी शशिबाला
किरण किरण में जो छलकाती जाम जुम्हाई का हाला,
पीकर जिसको चेतनता खो लेने लगते हैं झपकी
तारकदल से पीनेवाले, रात नहीं है, मधुशाला।।३८।
किसी ओर मैं आँखें फेरूँ, दिखलाई देती हाला
किसी ओर मैं आँखें फेरूँ, दिखलाई देता प्याला,
किसी ओर मैं देखूं, मुझको दिखलाई देता साकी
किसी ओर देखूं, दिखलाई पड़ती मुझको मधुशाला।।३९।
साकी बन मुरली आई साथ लिए कर में प्याला,
जिनमें वह छलकाती लाई अधर-सुधा-रस की हाला,
योगिराज कर संगत उसकी नटवर नागर कहलाए,
देखो कैसों-कैसों को है नाच नचाती मधुशाला।।४०।
वादक बन मधु का विक्रेता लाया सुर-सुमधुर-हाला,
रागिनियाँ बन साकी आई भरकर तारों का प्याला,
विक्रेता के संकेतों पर दौड़ लयों, आलापों में,
पान कराती श्रोतागण को, झंकृत वीणा मधुशाला।।४१।
प्रियतम, अपने ही हाथों से आज पिलाऊँगा प्याला,
पहले भोग लगा लूँ तेरा फिर प्रसाद जग पाएगा,
सबसे पहले तेरा स्वागत करती मेरी मधुशाला।।१।
प्यास तुझे तो, विश्व तपाकर पूर्ण निकालूँगा हाला,
एक पाँव से साकी बनकर नाचूँगा लेकर प्याला,
जीवन की मधुता तो तेरे ऊपर कब का वार चुका,
आज निछावर कर दूँगा मैं तुझ पर जग की मधुशाला।।२।
प्रियतम, तू मेरी हाला है, मैं तेरा प्यासा प्याला,
अपने को मुझमें भरकर तू बनता है पीनेवाला,
मैं तुझको छक छलका करता, मस्त मुझे पी तू होता,
एक दूसरे की हम दोनों आज परस्पर मधुशाला।।३।
भावुकता अंगूर लता से खींच कल्पना की हाला,
कवि साकी बनकर आया है भरकर कविता का प्याला,
कभी न कण-भर खाली होगा लाख पिएँ, दो लाख पिएँ!
पाठकगण हैं पीनेवाले, पुस्तक मेरी मधुशाला।।४।
मधुर भावनाओं की सुमधुर नित्य बनाता हूँ हाला,
भरता हूँ इस मधु से अपने अंतर का प्यासा प्याला,
उठा कल्पना के हाथों से स्वयं उसे पी जाता हूँ,
अपने ही में हूँ मैं साकी, पीनेवाला, मधुशाला।।५।
मदिरालय जाने को घर से चलता है पीनेवाला,
'किस पथ से जाऊँ?' असमंजस में है वह भोलाभाला,
अलग-अलग पथ बतलाते सब पर मैं यह बतलाता हूँ -
'राह पकड़ तू एक चला चल, पा जाएगा मधुशाला।'। ६।
चलने ही चलने में कितना जीवन, हाय, बिता डाला!
'दूर अभी है', पर, कहता है हर पथ बतलानेवाला,
हिम्मत है न बढूँ आगे को साहस है न फिरुँ पीछे,
किंकर्तव्यविमूढ़ मुझे कर दूर खड़ी है मधुशाला।।७।
मुख से तू अविरत कहता जा मधु, मदिरा, मादक हाला,
हाथों में अनुभव करता जा एक ललित कल्पित प्याला,
ध्यान किए जा मन में सुमधुर सुखकर, सुंदर साकी का,
और बढ़ा चल, पथिक, न तुझको दूर लगेगी मधुशाला।।८।
मदिरा पीने की अभिलाषा ही बन जाए जब हाला,
अधरों की आतुरता में ही जब आभासित हो प्याला,
बने ध्यान ही करते-करते जब साकी साकार, सखे,
रहे न हाला, प्याला, साकी, तुझे मिलेगी मधुशाला।।९।
सुन, कलकल़ , छलछल़ मधुघट से गिरती प्यालों में हाला,
सुन, रूनझुन रूनझुन चल वितरण करती मधु साकीबाला,
बस आ पहुंचे, दुर नहीं कुछ, चार कदम अब चलना है,
चहक रहे, सुन, पीनेवाले, महक रही, ले, मधुशाला।।१०।
जलतरंग बजता, जब चुंबन करता प्याले को प्याला,
वीणा झंकृत होती, चलती जब रूनझुन साकीबाला,
डाँट डपट मधुविक्रेता की ध्वनित पखावज करती है,
मधुरव से मधु की मादकता और बढ़ाती मधुशाला।।११।
मेहंदी रंजित मृदुल हथेली पर माणिक मधु का प्याला,
अंगूरी अवगुंठन डाले स्वर्ण वर्ण साकीबाला,
पाग बैंजनी, जामा नीला डाट डटे पीनेवाले,
इन्द्रधनुष से होड़ लगाती आज रंगीली मधुशाला।।१२।
हाथों में आने से पहले नाज़ दिखाएगा प्याला,
अधरों पर आने से पहले अदा दिखाएगी हाला,
बहुतेरे इनकार करेगा साकी आने से पहले,
पथिक, न घबरा जाना, पहले मान करेगी मधुशाला।।१३।
लाल सुरा की धार लपट सी कह न इसे देना ज्वाला,
फेनिल मदिरा है, मत इसको कह देना उर का छाला,
दर्द नशा है इस मदिरा का विगत स्मृतियाँ साकी हैं,
पीड़ा में आनंद जिसे हो, आए मेरी मधुशाला।।१४।
जगती की शीतल हाला सी पथिक, नहीं मेरी हाला,
जगती के ठंडे प्याले सा पथिक, नहीं मेरा प्याला,
ज्वाल सुरा जलते प्याले में दग्ध हृदय की कविता है,
जलने से भयभीत न जो हो, आए मेरी मधुशाला।।१५।
बहती हाला देखी, देखो लपट उठाती अब हाला,
देखो प्याला अब छूते ही होंठ जला देनेवाला,
'होंठ नहीं, सब देह दहे, पर पीने को दो बूंद मिले'
ऐसे मधु के दीवानों को आज बुलाती मधुशाला।।१६।
धर्मग्रन्थ सब जला चुकी है, जिसके अंतर की ज्वाला,
मंदिर, मसजिद, गिरिजे, सब को तोड़ चुका जो मतवाला,
पंडित, मोमिन, पादिरयों के फंदों को जो काट चुका,
कर सकती है आज उसी का स्वागत मेरी मधुशाला।।१७।
लालायित अधरों से जिसने, हाय, नहीं चूमी हाला,
हर्ष-विकंपित कर से जिसने, हा, न छुआ मधु का प्याला,
हाथ पकड़ लज्जित साकी को पास नहीं जिसने खींचा,
व्यर्थ सुखा डाली जीवन की उसने मधुमय मधुशाला।।१८।
बने पुजारी प्रेमी साकी, गंगाजल पावन हाला,
रहे फेरता अविरत गति से मधु के प्यालों की माला'
'और लिये जा, और पीये जा', इसी मंत्र का जाप करे'
मैं शिव की प्रतिमा बन बैठूं, मंदिर हो यह मधुशाला।।१९।
बजी न मंदिर में घड़ियाली, चढ़ी न प्रतिमा पर माला,
बैठा अपने भवन मुअज्ज़िन देकर मस्जिद में ताला,
लुटे ख़जाने नरपितयों के गिरीं गढ़ों की दीवारें,
रहें मुबारक पीनेवाले, खुली रहे यह मधुशाला।।२०।
बड़े बड़े परिवार मिटें यों, एक न हो रोनेवाला,
हो जाएँ सुनसान महल वे, जहाँ थिरकतीं सुरबाला,
राज्य उलट जाएँ, भूपों की भाग्य सुलक्ष्मी सो जाए,
जमे रहेंगे पीनेवाले, जगा करेगी मधुशाला।।२१।
सब मिट जाएँ, बना रहेगा सुन्दर साकी, यम काला,
सूखें सब रस, बने रहेंगे, किन्तु, हलाहल औ' हाला,
धूमधाम औ' चहल पहल के स्थान सभी सुनसान बनें,
झगा करेगा अविरत मरघट, जगा करेगी मधुशाला।।२२।
भुरा सदा कहलायेगा जग में बाँका, मदचंचल प्याला,
छैल छबीला, रसिया साकी, अलबेला पीनेवाला,
पटे कहाँ से, मधु औ' जग की जोड़ी ठीक नहीं,
जग जर्जर प्रतिदन, प्रतिक्षण, पर नित्य नवेली मधुशाला।।२३।
बिना पिये जो मधुशाला को बुरा कहे, वह मतवाला,
पी लेने पर तो उसके मुह पर पड़ जाएगा ताला,
दास द्रोहियों दोनों में है जीत सुरा की, प्याले की,
विश्वविजयिनी बनकर जग में आई मेरी मधुशाला।।२४।
हरा भरा रहता मदिरालय, जग पर पड़ जाए पाला,
वहाँ मुहर्रम का तम छाए, यहाँ होलिका की ज्वाला,
स्वर्ग लोक से सीधी उतरी वसुधा पर, दुख क्या जाने,
पढ़े मर्सिया दुनिया सारी, ईद मनाती मधुशाला।।२५।
एक बरस में, एक बार ही जगती होली की ज्वाला,
एक बार ही लगती बाज़ी, जलती दीपों की माला,
दुनियावालों, किन्तु, किसी दिन आ मदिरालय में देखो,
दिन को होली, रात दिवाली, रोज़ मनाती मधुशाला।।२६।
नहीं जानता कौन, मनुज आया बनकर पीनेवाला,
कौन अपिरिचत उस साकी से, जिसने दूध पिला पाला,
जीवन पाकर मानव पीकर मस्त रहे, इस कारण ही,
जग में आकर सबसे पहले पाई उसने मधुशाला।।२७।
बनी रहें अंगूर लताएँ जिनसे मिलती है हाला,
बनी रहे वह मिटटी जिससे बनता है मधु का प्याला,
बनी रहे वह मदिर पिपासा तृप्त न जो होना जाने,
बनें रहें ये पीने वाले, बनी रहे यह मधुशाला।।२८।
सकुशल समझो मुझको, सकुशल रहती यदि साकीबाला,
मंगल और अमंगल समझे मस्ती में क्या मतवाला,
मित्रों, मेरी क्षेम न पूछो आकर, पर मधुशाला की,
कहा करो 'जय राम' न मिलकर, कहा करो 'जय मधुशाला'।।२९।
सूर्य बने मधु का विक्रेता, सिंधु बने घट, जल, हाला,
बादल बन-बन आए साकी, भूमि बने मधु का प्याला,
झड़ी लगाकर बरसे मदिरा रिमझिम, रिमझिम, रिमझिम कर,
बेलि, विटप, तृण बन मैं पीऊँ, वर्षा ऋतु हो मधुशाला।।३०।
तारक मणियों से सज्जित नभ बन जाए मधु का प्याला,
सीधा करके भर दी जाए उसमें सागरजल हाला,
मज्ञल्तऌा समीरण साकी बनकर अधरों पर छलका जाए,
फैले हों जो सागर तट से विश्व बने यह मधुशाला।।३१।
अधरों पर हो कोई भी रस जिह्वा पर लगती हाला,
भाजन हो कोई हाथों में लगता रक्खा है प्याला,
हर सूरत साकी की सूरत में परिवर्तित हो जाती,
आँखों के आगे हो कुछ भी, आँखों में है मधुशाला।।३२।
पौधे आज बने हैं साकी ले ले फूलों का प्याला,
भरी हुई है जिसके अंदर पिरमल-मधु-सुरिभत हाला,
माँग माँगकर भ्रमरों के दल रस की मदिरा पीते हैं,
झूम झपक मद-झंपित होते, उपवन क्या है मधुशाला!।३३।
प्रति रसाल तरू साकी सा है, प्रति मंजरिका है प्याला,
छलक रही है जिसके बाहर मादक सौरभ की हाला,
छक जिसको मतवाली कोयल कूक रही डाली डाली
हर मधुऋतु में अमराई में जग उठती है मधुशाला।।३४।
मंद झकोरों के प्यालों में मधुऋतु सौरभ की हाला
भर भरकर है अनिल पिलाता बनकर मधु-मद-मतवाला,
हरे हरे नव पल्लव, तरूगण, नूतन डालें, वल्लरियाँ,
छक छक, झुक झुक झूम रही हैं, मधुबन में है मधुशाला।।३५।
साकी बन आती है प्रातः जब अरुणा ऊषा बाला,
तारक-मणि-मंडित चादर दे मोल धरा लेती हाला,
अगणित कर-किरणों से जिसको पी, खग पागल हो गाते,
प्रति प्रभात में पूर्ण प्रकृति में मुखिरत होती मधुशाला।।३६।
उतर नशा जब उसका जाता, आती है संध्या बाला,
बड़ी पुरानी, बड़ी नशीली नित्य ढला जाती हाला,
जीवन के संताप शोक सब इसको पीकर मिट जाते
सुरा-सुप्त होते मद-लोभी जागृत रहती मधुशाला।।३७।
अंधकार है मधुविक्रेता, सुन्दर साकी शशिबाला
किरण किरण में जो छलकाती जाम जुम्हाई का हाला,
पीकर जिसको चेतनता खो लेने लगते हैं झपकी
तारकदल से पीनेवाले, रात नहीं है, मधुशाला।।३८।
किसी ओर मैं आँखें फेरूँ, दिखलाई देती हाला
किसी ओर मैं आँखें फेरूँ, दिखलाई देता प्याला,
किसी ओर मैं देखूं, मुझको दिखलाई देता साकी
किसी ओर देखूं, दिखलाई पड़ती मुझको मधुशाला।।३९।
साकी बन मुरली आई साथ लिए कर में प्याला,
जिनमें वह छलकाती लाई अधर-सुधा-रस की हाला,
योगिराज कर संगत उसकी नटवर नागर कहलाए,
देखो कैसों-कैसों को है नाच नचाती मधुशाला।।४०।
वादक बन मधु का विक्रेता लाया सुर-सुमधुर-हाला,
रागिनियाँ बन साकी आई भरकर तारों का प्याला,
विक्रेता के संकेतों पर दौड़ लयों, आलापों में,
पान कराती श्रोतागण को, झंकृत वीणा मधुशाला।।४१।
हरिवंशराय बच्चन » मधुशाला / भाग ७
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वह हाला, कर शांत सके जो मेरे अंतर की ज्वाला,
जिसमें मैं बिंबित-प्रतिबिंबत प्रतिपल, वह मेरा प्याला,
मधुशाला वह नहीं जहाँ पर मदिरा बेची जाती है,
भेंट जहाँ मस्ती की मिलती मेरी तो वह मधुशाला।।१२१।
मतवालापन हाला से लेकर मैंने तज दी है हाला,
पागलपन लेकर प्याले से, मैंने त्याग दिया प्याला,
साकी से मिल, साकी में मिल, अपनापन मैं भूल गया,
मिल मधुशाला की मधुता में भूल गया मैं मधुशाला।।१२२।
मदिरालय के द्वार ठोकता किस्मत का छूंछा प्याला,
गहरी, ठंडी सांसें भर भर कहता था हर मतवाला,
कितनी थोड़ी सी यौवन की हाला, हा, मैं पी पाया!
बंद हो गई कितनी जल्दी मेरी जीवन मधुशाला।।१२३।
कहाँ गया वह स्वर्गिक साकी, कहाँ गयी सुरिभत हाला,
कहाँ गया स्वपिनल मदिरालय, कहाँ गया स्वर्णिम प्याला!
पीनेवालों ने मदिरा का मूल्य, हाय, कब पहचाना?
फूट चुका जब मधु का प्याला, टूट चुकी जब मधुशाला।।१२४।
अपने युग में सबको अनुपम ज्ञात हुई अपनी हाला,
अपने युग में सबको अदभुत ज्ञात हुआ अपना प्याला,
फिर भी वृद्धों से जब पूछा एक यही उत्तर पाया -
अब न रहे वे पीनेवाले, अब न रही वह मधुशाला!।१२५।
'मय' को करके शुद्ध दिया अब नाम गया उसको, 'हाला'
'मीना' को 'मधुपात्र' दिया 'सागर' को नाम गया 'प्याला',
क्यों न मौलवी चौंकें, बिचकें तिलक-त्रिपुंडी पंडित जी
'मय-महिफल' अब अपना ली है मैंने करके 'मधुशाला'।।१२६।
कितने मर्म जता जाती है बार-बार आकर हाला,
कितने भेद बता जाता है बार-बार आकर प्याला,
कितने अर्थों को संकेतों से बतला जाता साकी,
फिर भी पीनेवालों को है एक पहेली मधुशाला।।१२७।
जितनी दिल की गहराई हो उतना गहरा है प्याला,
जितनी मन की मादकता हो उतनी मादक है हाला,
जितनी उर की भावुकता हो उतना सुन्दर साकी है,
जितना हो जो रिसक, उसे है उतनी रसमय मधुशाला।।१२८।
जिन अधरों को छुए, बना दे मस्त उन्हें मेरी हाला,
जिस कर को छू दे, कर दे विक्षिप्त उसे मेरा प्याला,
आँख चार हों जिसकी मेरे साकी से दीवाना हो,
पागल बनकर नाचे वह जो आए मेरी मधुशाला।।१२९।
हर जिहवा पर देखी जाएगी मेरी मादक हाला
हर कर में देखा जाएगा मेरे साकी का प्याला
हर घर में चर्चा अब होगी मेरे मधुविक्रेता की
हर आंगन में गमक उठेगी मेरी सुरिभत मधुशाला।।१३०।
मेरी हाला में सबने पाई अपनी-अपनी हाला,
मेरे प्याले में सबने पाया अपना-अपना प्याला,
मेरे साकी में सबने अपना प्यारा साकी देखा,
जिसकी जैसी रुचि थी उसने वैसी देखी मधुशाला।।१३१।
यह मदिरालय के आँसू हैं, नहीं-नहीं मादक हाला,
यह मदिरालय की आँखें हैं, नहीं-नहीं मधु का प्याला,
किसी समय की सुखदस्मृति है साकी बनकर नाच रही,
नहीं-नहीं किव का हृदयांगण, यह विरहाकुल मधुशाला।।१३२।
कुचल हसरतें कितनी अपनी, हाय, बना पाया हाला,
कितने अरमानों को करके ख़ाक बना पाया प्याला!
पी पीनेवाले चल देंगे, हाय, न कोई जानेगा,
कितने मन के महल ढहे तब खड़ी हुई यह मधुशाला!।१३३।
विश्व तुम्हारे विषमय जीवन में ला पाएगी हाला
यदि थोड़ी-सी भी यह मेरी मदमाती साकीबाला,
शून्य तुम्हारी घड़ियाँ कुछ भी यदि यह गुंजित कर पाई,
जन्म सफल समझेगी जग में अपना मेरी मधुशाला।।१३४।
बड़े-बड़े नाज़ों से मैंने पाली है साकीबाला,
कलित कल्पना का ही इसने सदा उठाया है प्याला,
मान-दुलारों से ही रखना इस मेरी सुकुमारी को,
विश्व, तुम्हारे हाथों में अब सौंप रहा हूँ मधुशाला।।१३५।
पिरिशष्ट से
स्वयं नहीं पीता, औरों को, किन्तु पिला देता हाला,
स्वयं नहीं छूता, औरों को, पर पकड़ा देता प्याला,
पर उपदेश कुशल बहुतेरों से मैंने यह सीखा है,
स्वयं नहीं जाता, औरों को पहुंचा देता मधुशाला।
मैं कायस्थ कुलोदभव मेरे पुरखों ने इतना ढ़ाला,
मेरे तन के लोहू में है पचहत्तर प्रतिशत हाला,
पुश्तैनी अधिकार मुझे है मदिरालय के आँगन पर,
मेरे दादों परदादों के हाथ बिकी थी मधुशाला।
बहुतों के सिर चार दिनों तक चढ़कर उतर गई हाला,
बहुतों के हाथों में दो दिन छलक झलक रीता प्याला,
पर बढ़ती तासीर सुरा की साथ समय के, इससे ही
और पुरानी होकर मेरी और नशीली मधुशाला।
पित्र पक्ष में पुत्र उठाना अर्ध्य न कर में, पर प्याला
बैठ कहीं पर जाना, गंगा सागर में भरकर हाला
किसी जगह की मिटटी भीगे, तृप्ति मुझे मिल जाएगी
तर्पण अर्पण करना मुझको, पढ़ पढ़ कर के मधुशाला।
<< पिछला पृष्ठ पृष्ठ सारणी
वह हाला, कर शांत सके जो मेरे अंतर की ज्वाला,
जिसमें मैं बिंबित-प्रतिबिंबत प्रतिपल, वह मेरा प्याला,
मधुशाला वह नहीं जहाँ पर मदिरा बेची जाती है,
भेंट जहाँ मस्ती की मिलती मेरी तो वह मधुशाला।।१२१।
मतवालापन हाला से लेकर मैंने तज दी है हाला,
पागलपन लेकर प्याले से, मैंने त्याग दिया प्याला,
साकी से मिल, साकी में मिल, अपनापन मैं भूल गया,
मिल मधुशाला की मधुता में भूल गया मैं मधुशाला।।१२२।
मदिरालय के द्वार ठोकता किस्मत का छूंछा प्याला,
गहरी, ठंडी सांसें भर भर कहता था हर मतवाला,
कितनी थोड़ी सी यौवन की हाला, हा, मैं पी पाया!
बंद हो गई कितनी जल्दी मेरी जीवन मधुशाला।।१२३।
कहाँ गया वह स्वर्गिक साकी, कहाँ गयी सुरिभत हाला,
कहाँ गया स्वपिनल मदिरालय, कहाँ गया स्वर्णिम प्याला!
पीनेवालों ने मदिरा का मूल्य, हाय, कब पहचाना?
फूट चुका जब मधु का प्याला, टूट चुकी जब मधुशाला।।१२४।
अपने युग में सबको अनुपम ज्ञात हुई अपनी हाला,
अपने युग में सबको अदभुत ज्ञात हुआ अपना प्याला,
फिर भी वृद्धों से जब पूछा एक यही उत्तर पाया -
अब न रहे वे पीनेवाले, अब न रही वह मधुशाला!।१२५।
'मय' को करके शुद्ध दिया अब नाम गया उसको, 'हाला'
'मीना' को 'मधुपात्र' दिया 'सागर' को नाम गया 'प्याला',
क्यों न मौलवी चौंकें, बिचकें तिलक-त्रिपुंडी पंडित जी
'मय-महिफल' अब अपना ली है मैंने करके 'मधुशाला'।।१२६।
कितने मर्म जता जाती है बार-बार आकर हाला,
कितने भेद बता जाता है बार-बार आकर प्याला,
कितने अर्थों को संकेतों से बतला जाता साकी,
फिर भी पीनेवालों को है एक पहेली मधुशाला।।१२७।
जितनी दिल की गहराई हो उतना गहरा है प्याला,
जितनी मन की मादकता हो उतनी मादक है हाला,
जितनी उर की भावुकता हो उतना सुन्दर साकी है,
जितना हो जो रिसक, उसे है उतनी रसमय मधुशाला।।१२८।
जिन अधरों को छुए, बना दे मस्त उन्हें मेरी हाला,
जिस कर को छू दे, कर दे विक्षिप्त उसे मेरा प्याला,
आँख चार हों जिसकी मेरे साकी से दीवाना हो,
पागल बनकर नाचे वह जो आए मेरी मधुशाला।।१२९।
हर जिहवा पर देखी जाएगी मेरी मादक हाला
हर कर में देखा जाएगा मेरे साकी का प्याला
हर घर में चर्चा अब होगी मेरे मधुविक्रेता की
हर आंगन में गमक उठेगी मेरी सुरिभत मधुशाला।।१३०।
मेरी हाला में सबने पाई अपनी-अपनी हाला,
मेरे प्याले में सबने पाया अपना-अपना प्याला,
मेरे साकी में सबने अपना प्यारा साकी देखा,
जिसकी जैसी रुचि थी उसने वैसी देखी मधुशाला।।१३१।
यह मदिरालय के आँसू हैं, नहीं-नहीं मादक हाला,
यह मदिरालय की आँखें हैं, नहीं-नहीं मधु का प्याला,
किसी समय की सुखदस्मृति है साकी बनकर नाच रही,
नहीं-नहीं किव का हृदयांगण, यह विरहाकुल मधुशाला।।१३२।
कुचल हसरतें कितनी अपनी, हाय, बना पाया हाला,
कितने अरमानों को करके ख़ाक बना पाया प्याला!
पी पीनेवाले चल देंगे, हाय, न कोई जानेगा,
कितने मन के महल ढहे तब खड़ी हुई यह मधुशाला!।१३३।
विश्व तुम्हारे विषमय जीवन में ला पाएगी हाला
यदि थोड़ी-सी भी यह मेरी मदमाती साकीबाला,
शून्य तुम्हारी घड़ियाँ कुछ भी यदि यह गुंजित कर पाई,
जन्म सफल समझेगी जग में अपना मेरी मधुशाला।।१३४।
बड़े-बड़े नाज़ों से मैंने पाली है साकीबाला,
कलित कल्पना का ही इसने सदा उठाया है प्याला,
मान-दुलारों से ही रखना इस मेरी सुकुमारी को,
विश्व, तुम्हारे हाथों में अब सौंप रहा हूँ मधुशाला।।१३५।
पिरिशष्ट से
स्वयं नहीं पीता, औरों को, किन्तु पिला देता हाला,
स्वयं नहीं छूता, औरों को, पर पकड़ा देता प्याला,
पर उपदेश कुशल बहुतेरों से मैंने यह सीखा है,
स्वयं नहीं जाता, औरों को पहुंचा देता मधुशाला।
मैं कायस्थ कुलोदभव मेरे पुरखों ने इतना ढ़ाला,
मेरे तन के लोहू में है पचहत्तर प्रतिशत हाला,
पुश्तैनी अधिकार मुझे है मदिरालय के आँगन पर,
मेरे दादों परदादों के हाथ बिकी थी मधुशाला।
बहुतों के सिर चार दिनों तक चढ़कर उतर गई हाला,
बहुतों के हाथों में दो दिन छलक झलक रीता प्याला,
पर बढ़ती तासीर सुरा की साथ समय के, इससे ही
और पुरानी होकर मेरी और नशीली मधुशाला।
पित्र पक्ष में पुत्र उठाना अर्ध्य न कर में, पर प्याला
बैठ कहीं पर जाना, गंगा सागर में भरकर हाला
किसी जगह की मिटटी भीगे, तृप्ति मुझे मिल जाएगी
तर्पण अर्पण करना मुझको, पढ़ पढ़ कर के मधुशाला।
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